ग्राउंड रिपोर्टः लॉकडाउन में रोजगार का जरिया बन रही मनरेगा

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लॉकडाउन के दौरान लाखों लोग शहरों से मायूस होकर घर लौटे। शहर में कमाई का जरिया बंद हो चुका था और घर लौटे प्रवासियों की जेबें खाली हैं। लेकिन ऐसे समय में मनरेगा उनकी कमाई का जरिया बना।

उत्तर प्रदेश के बुंदलेखंड के समोंगर ग्राम पंचायत की मीरा पिछले 17 दिनों से मनरेगा में लगातार काम कर रही हैं। मीरा कहती हैं, “अगर मनेरगा का काम नहीं मिलता तो घर चलाना मुश्किल हो जाता, क्योंकि गांव में कोई काम नहीं बचा था। लॉकडाउन था तो लकड़ियां भी बेचने नहीं जा पा रहे थे।”

बंदेलखंड के सबसे पिछड़े जिलों में शामिल ललितपुर में 50 हजार से ज्यादा लोग 20 मई तक वापस आ चुके थे। ललितपुर जिले में एक जून को सरकारी आंकड़ों के अऩुसार 63277 श्रमिकों को मनरेगा (Mgnrega) में काम मिला था।

गांव कनेक्शन की टीम से बात करते हुए ललितपुर के जिलाधिकारी योगेश कुमार शुक्ला कहते हैं, “ललितपुर में लौटने वाले प्रवासियों की संख्या काफी ज्यादा हैं। हमें ग्राम समितियों के माध्यम से जो जानकारी मिल रही है उसके अऩुसार 50 हजार से ज्यादा लोग लौट चुके हैं। हमारी कोशिश है कि इन सबको संक्रमण से सुरक्षित रखते हुए स्वयं सहायता समितियों और मनरेगा के जरिए रोजगार दिया जाए। जो भी व्यक्ति काम मांगेगा उसे हर हाल में काम मिलेगा।”

ललितपुर बुदेलखंड के सबसे पिछ़ड़े जिलों में आता है। पथरीली जमीन और पानी की कमी के चलते यहां रोजगार के नाम पर पलायन और खनन का काम होता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यहां से खदानों का काम बंद हुआ, खेती प्राकृतिक आपदाओं (ओलावृष्टि, सूखा) से जूझती रही, जिसके चलते पलायन बढ़ गया है।

करीब 75 हजार सहरिया आदिवासी वाले ललितपुर के लोग इंदौर, दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद, सूरत, भिवंडी से लेकर पंजाब और लखनऊ तक रोजी रोटी की तलाश में जाते हैं। साल 2019 में मनरेगा में ललितपुर में एक लाख 14 हजार एक्टिव जॉब कार्ड थे, जिनकी संख्या 1 जून को बढ़कर 1 लाख 83 हजार हो गई थी। लॉकडाउन के दौरान 6953 नए जॉब कार्ड बने थे जबकि 50 हजार पुराने कार्ड को एक्टिव किया गया। ये वो लोग थे जो पिछले कई वर्षों से मनरेगा में काम नहीं कर रहे थे।

कमोबेश यही हालात उत्तर प्रदेश के दूसरे जिलों के भी हैं। मनरेगा की वेबसाइट के मुताबिक उत्तर प्रदेश में करीब 89 लाख एक्टिव जॉब कार्ड हैं। पांच जून 2020 तक 49 लाख 70 हजार परिवारों को मनरेगा से रोजगार उपलब्ध कराया गया।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पिछले दिनों कहा था कि उनका लक्ष्य प्रदेश में रोजाना 50 लाख मजदूरों को काम देने का है। ललितुपर में महरौली तहसील के सिलावन ग्राम पंचायत में 22 मई को चार जगहों पर चार अलग-अलग तरह के काम हो रहे थे। एक जगह पर 100 से ज्यादा महिला-पुरुष खेत की मेड़बंदी कर रहे थे।

वहीं पास में खड़े गांव के प्रधान प्रकाश नारायण त्रिपाठी कहते हैं, “पिछले 15 दिनों से रोजाना औसतन 150 लोगों को काम दिया जा रहा है। इनमें ज्यादातर लोग पहले के हैं जबकि कुछ वो लोग भी हैं जो शहरों से लौटे हैं और क्वारंटाइन अवधि पूरा करने के बाद काम कर रहे हैं।”

लेकिन न तो मनरेगा में हमेशा इतना काम था और न ही हर व्यक्ति को काम उसकी जरुरत के मुताबिक आज काम मिल रहा है। बालाबेहट गांव के राम सिंह सहरिया को लॉकडाउन से पहले पिछले 5 साल से काम नहीं मिला है तो इसी गांव के मनीराम को 22 मई तक सिर्फ 12 दिन लॉकडाउन में काम मिला

था। मनीराम कहते हैं, यहां कोई काम (खदान या मनरेगा) नहीं था तो गुना कमाने चले गए थे। दो महीना पहले आ गए थे। जब से बैठे थे इधर 12 दिन नरेगा (मनरेगा) में खंती (गड्डा खोदने) का काम मिला अब फिर बैठे हैं।

मनरेगा में पिछले दो वर्षों से काम तो कम मिला साथ ही पैसों का भुगतान देरी से हो रहा है लेकिन प्रधानों और अधिकारियों के मुताबिक लॉकडाउन में 7 से 15 दिन के अंदर पैसा खातों में पहुंच रहा है।

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