सोशल ऑडिट से मनरेगा मजदूरों में आई अधिकारों के प्रति जागरूकता

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सोशल ऑडिट से योजनाओं के क्रियान्वयन में समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित की जाती है औऱ संस्थाओं की जबाबदेही निर्धारित होने से गरीब पात्र परिवारों के हक सुनिश्चित होते हैं। सोशल ऑडिट में मनरेगा, प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना के साथ-साथ अब स्कूलों के मीड डे मील योजना को भी इस दायरे में लिया गया है।

भारत में 691 जिलों के 6,921 ब्लॉक की 2,62,642 ग्राम पंचायतों में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के अंतर्गत कुल 13.51 करोड़ जॉबकार्डो पर 26.38 करोड़ श्रमिक (मजदूर) दर्ज हैं। सोशल ऑडिट नियम के अनुसार इन पंचायतों में योजनाओं से वित्तीय वर्ष में कराये गये कार्यो की सोशल ऑडिट टीम के सदस्य व गांव के लोग सरकारी कल्याणकारी योजनाओं के कार्यो की निगरानी एवं मूल्यांकन अपने स्तर से स्वयं करते हैं।

सोशल ऑडिट टीम चार से पाँच दिन में गांव में रहकर समुदाय को साथ लेकर कार्यों का स्थलीय परीक्षण, जनसंपर्क, योजना के अभिलेखों का सत्यापन करने के बाद जनसमुदाय के बीच ग्राम सभा सोशल ऑडिट होता है। इससे योजना के कार्यो में पारदर्शिता एवं जबावदेही तय होती है। इसके लिए वर्ष में एक बार सोशल ऑडिट ग्राम सभा होती है। जिसमें सोशल ऑडिट टीम, पंचायत से जुड़े जनप्रतिनिधि और अधिकारी शामिल होते हैं। बैठक का प्रचार-प्रसार जागरूकता रैली के माध्यम से किया जाता है, जिससे गाँव के अधिक लोग बैठक में प्रतिभाग कर सकें।

सोशल ऑडिट ब्लॉक कोऑर्डिनेटर धनीरम वर्मा कहते हैं, “पहले पहले चरण में जन समुदाय के साथ योजना के कामों का स्थलीय सत्यापन करते हैं। दूसरे चरण में जनसंपर्क के दौरान जो उस योजना से जुड़े लाभार्थी होते हैं उन लाभार्थियों से मिला जाता है उनके जो भी सवाल, समस्याएं और शिकायतें होती हैं। उनको तथ्यात्मक ढंग से संकलित कर तीसरे चरण में योजनाओं के अभिलेखों से सत्यापन एमआईएस की रिर्पोट से करते हैं। सत्यापन के बाद जो भी कमियां निकल के सामने आती हैं उनको हम लोग पायी गई कमियों को ड्राफ्ट प्रतिवेदन में शामिल करते हैं।”

सोशल ऑडिट से पूर्व योजनाओं के नियम जिम्मेदार कार्यदायी संस्थाओं की फाइलों तक सीमित रहा करते थे। जब से सोशल ऑडिट जैसा खुला मंच ग्रामीणों को मिलने लगा तब से ग्रामीण योजनाओं के सारे नियम अपने हक अधिकार उस खुले मंच के माध्यम से खुद समझने की बात करते हुए धनीराम वर्मा कहते हैं, ” मनरेगा में तमाम भ्रांतियां हुआ करती थी जाँवकार्ड के लिए श्रमिक महीनों भटका करते थे लेकिन अब सोशल ऑडिट जैसे खुले मंच पर उसका आसानी से जॉबकार्ड आवेदन ले लिया जाता हैं यदि किसी मजदूर को काम नहीं मिल पा रहा हैं उन मजदूरों के सामूहिक मांग पत्र ले लिये जाते हैं ताकि उनको आसानी से नियत समय के अंदर जॉबकार्ड भी मिल सके, उनको कार्य आवंटित भी हो सकें।”

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